Friday, 13 May 2016

सफर में..

छूटती जा रही राहों के
आगे-आगे भागी जा रही है
रेलगाड़ी सर्पीली आकृति-सी,
अंदर चादरें तन गई
बत्तियाँ बूझाने को मुसाफिर
कर रहे मनुहार हैं
छूटी जाती हैं राहें पीछे
बढ़ते आगे हम जा रहे
इसे रात का बितना कहें
या कहें, सहर होने वाला है


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