जीवन के क्षणों से निकल कर अनयास या (कभी-कभी) सायास कुछ भंगिमाएँ शब्दों में आकर समा जाती हैंं , उसे मैं कविता कहकर अपने पास रोक लेता हूँ ..उन्मुक्त आँगन में..!
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कहानी : नजरिया
“कितने हुए..? “-कुर्ते की ज़ेब में हाथ डालते हुए रामकिसुन ने पूछा। “पंद्रह रूपये हुजूर”- हांफते हुए कहा रिक्शेवाले ने। “अरेssss..!.. क्या...
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सफ़र जैसे-जैसे बढ़ता गया और चलने की चाह में चलता गया काटता गया बस सफ़र ज़िंदगी का और निकला था लेकर जो पोटली आनंद की धीरे-धीरे घटता...
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दूर हो रहे सितारे कभी मेरे थे और इनकी रौशनी भी कभी मेरे अख्तियार में हुआ करती थी। बड़े यत्न से तराशे किसी कोहिनूर से कम नहीं थी उसकी म...

Wah wah...
ReplyDeletethank u Neha
Deletevery very Nice....
ReplyDeletethank u Mohanlal ji
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