जीवन के क्षणों से निकल कर अनयास या (कभी-कभी) सायास कुछ भंगिमाएँ शब्दों में आकर समा जाती हैंं , उसे मैं कविता कहकर अपने पास रोक लेता हूँ ..उन्मुक्त आँगन में..!
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Tuesday, 25 April 2017
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कहानी : नजरिया
“कितने हुए..? “-कुर्ते की ज़ेब में हाथ डालते हुए रामकिसुन ने पूछा। “पंद्रह रूपये हुजूर”- हांफते हुए कहा रिक्शेवाले ने। “अरेssss..!.. क्या...
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“कितने हुए..? “-कुर्ते की ज़ेब में हाथ डालते हुए रामकिसुन ने पूछा। “पंद्रह रूपये हुजूर”- हांफते हुए कहा रिक्शेवाले ने। “अरेssss..!.. क्या...
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सफ़र जैसे-जैसे बढ़ता गया और चलने की चाह में चलता गया काटता गया बस सफ़र ज़िंदगी का और निकला था लेकर जो पोटली आनंद की धीरे-धीरे घटता...
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झटक कर डब्बे से सिगरेट-सा थाम लेता हूँ एक अंदाज तेरा सुलगते अहसास के माचिस से फिर जलाता हूँ हरेक अरमान अपना। आकाश के नीचे बुन जाता है ...
